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जिस प्रकार भारतीय धर्मग्रंथों को ऐतिहासिक रूप से प्रमाणिक नहीं माना जाता रहा है ठीक उसी प्रकार इन धर्मग्रंथों में दिखाए गए महान व्यक्तित्व भी। इसका कुल कारण ये है कि इन धर्मग्रंथों को कभी भी पश्चिमी इतिहासकारों के तर्ज पर समय के सापेक्ष तथ्यात्मक रूप से प्रस्तुत नहीं किया गया। लेकिन क्या इसका मतलब ये हैं कि हम अपने पौराणिक महानायकों को मिथक की श्रेणी में रखकर इनकी ऐतिहासिक प्रमाणिकता पर हीं प्रश्न उठाने लगे ? या कि बेहतर ये होगा कि इस तथ्य को जानकार कि ऐसा घटित हीं क्यों हुआ , इसकी तह तक जाये और प्रमाण के साथ भगवान श्रीकृष्ण आदि जैसे महान व्यक्तित्व के प्रमाणिकता की पुष्टि करे ? मेरे देखे दूसरा विकल्प हीं श्रेयकर है। और यदि हम दूसरा विकल्प चुनकर सत्य की तहकीकात करें तो हमे ये सत्य प्रमाणिक रूप से निकल कर आता है कि आज से, अर्थात वर्तमान साल 2022 से लगभग 4053 साल पहले भगवान श्रीकृष्ण का अस्तित्व इस धरती पर था। आइए देखते हैं कैसे?


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चंद्रगुप्त की जुबानी , भगवान श्रीकृष्ण की कहानी

जिस प्रकार भारतीय धर्मग्रंथों को ऐतिहासिक रूप से प्रमाणिक नहीं माना जाता रहा है ठीक उसी प्रकार इन धर्मग्रंथों में दिखाए गए महान व्यक्तित्व भी। इसका कुल कारण ये है कि इन धर्मग्रंथों को कभी भी पश्चिमी इतिहासकारों के तर्ज पर समय के सापेक्ष तथ्यात्मक रूप से प्रस्तुत नहीं किया गया।


लेकिन क्या इसका मतलब ये हैं कि हम अपने पौराणिक महानायकों को मिथक की श्रेणी में रखकर इनकी ऐतिहासिक प्रमाणिकता पर हीं प्रश्न उठाने लगे ? या कि बेहतर ये होगा कि इस तथ्य को जानकार कि ऐसा घटित हीं क्यों हुआ , इसकी तह तक जाये और प्रमाण के साथ भगवान श्रीकृष्ण आदि जैसे महान व्यक्तित्व के प्रमाणिकता की पुष्टि करे ? मेरे देखे दूसरा विकल्प हीं श्रेयकर है।


और यदि हम दूसरा विकल्प चुनकर सत्य की तहकीकात करें तो हमे ये सत्य प्रमाणिक रूप से निकल कर आता है कि आज से, अर्थात वर्तमान साल 2022 से लगभग 4053 साल पहले भगवान श्रीकृष्ण का अस्तित्व इस धरती पर था। आइए देखते हैं कैसे?


सर्वप्रथम ये देखते हैं पुराणों और वेदों में वर्णित व्यक्तित्वों को संदेह से देखे जाने का कारण क्या है ? फिर आगे प्रमाण की बात कर लेंगे। वेद , पुराण, महाभारत आदि ग्रंथों का मुख्य ध्येय भारतीय मनीषियों द्वारा अर्जित किए गए परम अनुभव और ज्ञान को आम जन मानस में प्रवाहित करना था। अपनी इसी शैली के कारण आज भगवान श्रीकृष्ण , श्रीराम जी आदि को ऐतिहासिक रूप से उस तरह से प्रमाणित नहीं माना जाता जैसे कि गौतम बुद्ध , महावीर जैन मुनि, गुरु नानक साहब जी इत्यादि महापुरुषों को।


लेकिन इन धर्मग्रंथों का यदि ध्यान से हम अवलोकन करेंगे तो तो इनके ऐतिहासिक रूप से प्रमाणिक होने के अनगिनत प्रमाण मिलने लगते हैं। इन धर्मग्रंथों में रचित पात्र मात्र किदवंती नहीं अपितु वास्तविक महानायक हैं। जरूरत है तो मात्र स्वयं के नजरिए को बदलने की, जो कि पश्चिमी इतिहासकारों के प्रभाव के कारण दूषित हो गए हैं।


चंद्रगुप्त मौर्य, धनानंद, चाणक्य, पुष्यमित्र शुंग इत्यादि के ऐतिहासिक प्रमाणिकता के बारे में कोई संदेह नहीं किया जा सकता।चंद्रगुप्त के पोते सम्राट अशोक को तो ऐतिहासिक रूप से प्रमाणिक माना जाता है। सम्राट अशोक के चिन्ह को हीं इस देश का राज चिन्ह बना दिया गया है। ऐसे में अगर इनसे संबंधित जानकारी किसी धर्म ग्रंथों में मिलता है तो फिर इनकी प्रमाणिकता पर संदेह उठाना कहां से उचित होगा?


अगर कोई आपसे ये कहे कि किसी वेद या पुराण में सम्राट चंद्रगुप्त, चाणक्य, वृहद्रथ, पुष्यमित्र शुंग, नंद वंश इत्यादि में बारे में विस्तार से वर्णन किया गया हो तो क्या आप श्रीकृष्ण या प्रभु श्रीराम की प्रमाणिकता पर आप संदेह कर पाएंगे? आइए देखते हैं इन तथ्यों में से एक ऐसा तथ्य तो वेद और पुराण की लिखी गई घटनाओं के प्रमाणिकता की पुष्टि करते हैं।


यदि हम भारतीय इतिहास को खंगाले तो सिकंदर के समकालीन होने के कारण नंद वंश तक का जिक्र बड़ी आसानी से मिल जाता है। परंतु नंद वंश के पहले आने वाले राजाओं की वंशावली का क्या? इनके बारे में कहां से जानकारी मिल सकती है?


पुराणों की गहराई से अवलोकन करने से बहुत तथ्य ऐसे मिलते हैं जिनकी ऐतिहासिक प्रमाणिकता पर संदेह नहीं किया जा सकता। इनमे से एक ऐसा ग्रंथ भागवद पुराण है जो श्रीकृष्ण के समकालीन जरासंध से लेकर नंदवंश, मौर्य वंश, शुंग वंश, तुर्क, यूनानी वंश, बहलिक वंश इत्यादि के बारे में बताता है।


भगवाद पुराण वेद व्यास द्वारा रचित 18 पुराणों में से एक पुराण है जो कि अर्जुन के पोते राजा परीक्षित और महात्मा शुकदेव के वार्तालाप के बीच आधारित है। ये ग्रंथ भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति से ओत प्रोत है।


इस ग्रंथ में शुकदेव जी कलियोग में होने वाले घटनाओं का वर्णन करते हैं। इसी प्रक्रिया के दौरान वो राजा परीक्षित को महाभारत काल के बाद से लेकर भविष्य में आने वाले राजवंशों का वर्णन करते हैं। इसी दौरान वो जरासंध, सम्राट चंद्रगुप्त, चाणक्य, वृहद्रथ, पुष्यमित्र शुंग, नंद वंश, कण्व वंश आदि के बारे में राजा परीक्षित को बताते हैं। आइए देखते हैं इसकी चर्चा कैसे की गई है।


हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार महाभारत की घटना द्वापर युग में हुई थी। युधिष्ठिर के स्वर्गारोहण के बाद और राजा परीक्षित के अवसान के बाद कलियुग का आगमन होता है। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि महाभारत की घटना घटने के बाद हीं कालियुग का पदार्पण होता है। कलियुग में आने वाले राजवंशों और लोगो के व्यवहार का वर्णन भागवद पुराण में किया गया है।


भागवद पुराण के नवम स्कन्ध [अर्थात 9 वें स्कन्ध] के बाइंसवें अध्याय के श्लोक संख्या से श्लोक संख्या 40 से 45 में राजा क्षेमक , जो कि सोमवंश का अंतिम राजा था, उसके बारे में बताया गया है कि द्वापर युग का वो अंतिम राजा होगा तथा उसके आने के बाद कलियुग की शुरुआत हो जाती है। इसके बाद श्लोक संख्या 46 से श्लोक संख्या 49 तक मगध वंश का वर्णन किया गया है। ये कुछ इस प्रकार है।


जरासन्ध के पुत्र सहदेव से मार्जारि, मार्जारि से श्रुतश्रवा, श्रुतश्रवा से अयुतायु और अयुतायु से निरमित्र नामक पुत्र होगा ॥ 46 ॥ निरमित्र के सुनक्षत्र, सुनक्षत्र के बृहत्सेन, बृहत्सेन के कर्मजित, कर्मजित के सृतञ्जय, सृतञ्जय के विप्र और विप्र के पुत्र का नाम होगा शुचि ॥ 47 ॥ शुचि से क्षेम, क्षेम से सुव्रत, सुव्रत से धर्म सूत्र, धर्मसूत्र से शम, शम से द्युमत्सेन, द्युमत्सेन से सुमति और सुमति से सुबल का जन्म होगा ॥ 48 ॥ सुबल का सुनीथ, सुनीथ का सत्यजित, सत्यजित का विश्वजित और विश्वजित का पुत्र रिपुञ्जय होगा। ये सब बृहद्रथवंश के राजा होंगे। इनका शासनकाल एक हजार वर्षके भीतर ही होगा ।। 49 ।।


जरासन्ध

[मगध वंश , 23 राजा, लगभग 1000साल]

[यह श्रीकृष्ण का समकालीन शासक था , तथा उनकी उपस्थिति में हीं भीम ने जरासंध का वध किया था]

सहदेव

मार्जारि

श्रुतश्रवा

अयुतायु

निरमित्र

सुनक्षत्र

बृहत्सेन

कर्मजित

सृतञ्जय

विप्र

शुचि

क्षेम

सुव्रत

धर्मसूत्र

शम

द्युमत्सेन

सुमति

सुबल

सुनीथ

सत्यजित

विश्वजित

रिपुञ्जय


इस प्रकार हम देखते हैं कि भागवद पुराण के नवम स्कन्ध के 22 वें अध्याय में जरासंध के पूरे वंश के बारे में चर्चा की गई है , जिसका कार्यकाल लगभग 1000 माना गया है। इसके बाद की घटने वाली घटनाओं का वर्णन भागवद पुराण के 12 वें स्कन्ध में अति विस्तार से किया गया है।


भागवद पुराण के द्वादश स्कन्ध [अर्थात 12 वें स्कन्ध] के प्रथम अध्याय के श्लोक संख्या 1 से श्लोक संख्या 43 में, जब महात्मा शुकदेव महाराजा परीक्षित को कलियुग में आने वाले राजवंशों का वर्णन करते हैं तो इन सारे राज वंशों के बारे में विस्तार से बताते हैं। इसकी शुरुआत राजा परीक्षित के प्रश्न पूछने से होती है।


जब राजा परीक्षित भगवान श्रीकृष्ण के स्वर्गारोहण के बाद आने वाले राजवंशों के बारे में पूछते हैं तब इसके उत्तर में शुकदेवजी कलियुग ने आने वाले राजवंशों के बारे में चर्चा करते हैं। इसी क्रम में चंद्रगुप्त मौर्य का भी जिक्र आता है। आइए देखते हैं कि भागवद पुराण में इस बात को कैसे लिखा गया है।


राजा परीक्षित ने पूछा भगवन , यदुवंश शिरोमणि भगवान श्रीकृष्ण जब अपने परम धाम पधार गये, तब पृथ्वी पर किस वंश का राज्य हुआ ? तथा अब किसका राज्य होगा ? आप कृपा करके मुझे यह बतलाइये ॥ 1 ॥


श्रीशुकदेवजीने कहा – प्रिय परीक्षित मैंने तुम्हें नवें स्कन्ध में यह बात बतलायी थी कि जरासन्ध के पिता बृहद्रथ के वंश में अन्तिम राजा होगा पुरञ्जय अथवा रिपुञ्जय। उसके मन्त्री का नाम होगा शुनक वह अपने स्वामी को मार डालेगा और अपने पुत्र प्रद्योत को राज सिंहासन पर अभिषिक्त करेगा।


प्रद्योत का पुत्र होगा पालक, पालक का विशाखयूप, विशाखयूप का राजक और राजक का पुत्र होगा नन्दिवर्द्धन। प्रद्योत वंश में यही पाँच नरपति होंगे। इनकी संज्ञा होगी 'प्रद्योतन' ये एक सौ अड़तीस वर्ष तक पृथ्वीका उपभोग करेंगे ॥ 2-4॥


श्री कृष्ण स्वर्गारोहण

I

बृहद्रथ

[लगभग 1000साल]

I

जरासन्ध

I

पुरञ्जय अथवा रिपुञ्जय

[जरासंध के वंश का अंतिम राजा]

I

मंत्री शुनक-प्रद्योत

I

प्रद्योत वंश

[पाँच नरपति]

[एक सौ अड़तीस वर्ष, अर्थात 148 वर्ष ]

I

पालक

I

विशाखयूप

I

राजक

I

नन्दिवर्द्धन


इसके पश्चात शिशुनाग नाम का राजा होगा। शिशुनाग का काकवर्ण, उसका क्षेमधर्मा और क्षेमधर्मा का पुत्र होगा क्षेत्रज्ञ ॥ 5 ॥ क्षेत्रज्ञ का विधिसार, उसका अजातशत्रु, फिर दर्भक और दर्भक का पुत्र अजय होगा ॥ 6 ॥ अजय से नन्दिवर्द्धन और उससे महानन्दि का जन्म होगा। शिशुनाग वंश में ये दस राजा होंगे। ये सब मिलकर कलियुगमें तीन सौ साठ वर्ष तक पृथ्वी पर राज्य करेंगे। प्रिय परीक्षित, महानन्दि की शूद्रा पत्नी के गर्भ से नन्द नाम का पुत्र होगा। वह बड़ा बलवान होगा। महानन्दि 'महापद्म' नामक निधि का अधिपति होगा। इसीलिये लोग उसे 'महापद्म' भी कहेंगे। वह क्षत्रिय राजाओंके विनाशका कारण बनेगा। तभी से राजालोग - प्रायः शूद्र और अधार्मिक हो जायँगे ।। 7-9॥


नन्दिवर्द्धन

शिशुनाग

[शिशूनाग वंश में 10 राजा और इसका कार्यकाल 360 साल तक]

काकवर्ण

क्षेमधर्मा

क्षेत्रज्ञ

विधिसार

[बिम्बिसार के नाम से भी जाना जाता है और ये गौतम बुद्ध का समकालीन था]

अजातशत्रु

[गौतम बुद्ध का समकालीन था]

दर्भक

अजय

नन्दिवर्द्धन

महानन्दि

नन्द

[इसे महापद्म के नाम से भी जाना जाता है]

चंद्रगुप्त मौर्य

[चाणक्य की सहायता से सम्राट बना जो कि सिकंदर का समकालीन था]


महापद्म पृथ्वी का एकच्छत्र शासक होगा। उसके शासन का उल्लंघन कोई भी नहीं कर सकेगा। क्षत्रियों के विनाश में हेतु होने की दृष्टि से तो उसे दूसरा परशुराम ही समझना चाहिये 10 ॥ उसके सुमाल्य आदि आठ पुत्र होंगे। वे सभी राजा होंगे और सौ वर्ष तक इस पृथ्वी का उपभोग करेंगे ॥ 11 ॥ कौटिल्य, वात्स्यायन तथा चाणक्य के नाम से प्रसिद्ध एक ब्राह्मण विश्व विख्यात नन्द और उनके सुमाल्य आदि आठ पुत्रों का नाश कर डालेगा। उनका नाश हो जानेपर कलियुग में मौर्य वंशी नरपति पृथ्वी का राज्य करेंगे ॥ 12 ॥ वही ब्राह्मण पहले पहल चन्द्रगुप्त मौर्य को राजाके पद पर अभिषिक्त करेगा।


चन्द्रगुप्त का पुत्र होगा वारिसार और वारिसार का अशोकवर्द्धन ॥ १३ ॥ अशोकवर्द्धन का पुत्र होगा सुयश । सुयश का सङ्गत, सङ्गत का शालिशूक और शालिक का सोमशर्मा ॥ १४ ॥ सोमशर्मा का शतधन्वा और शतधन्वा का पुत्र बृहद्रथ होगा। कुरुवंश विभूषण परीक्षित्, मौर्यवंश के ये दस नरपति कलियुग में एक सौ सैंतीस वर्ष तक पृथ्वीका उपभोग करेंगे। बृहद्रथ का सेनापति होगा पुष्यमित्र शुङ्ग। वह अपने स्वामीको मारकर स्वयं राजा बन बैठेगा।


चंद्रगुप्त मौर्य

[मौर्य वंश, 10 राजा, 137 साल]

वारिसार

[इसे बिम्बिसार के रूप में भी जाना जाता है]

अशोकवर्धन

[इसे महान सम्राट अशोक, चंडाशोक के नाम से भी जाना जाता है। इसने बौद्ध धर्म को पूरे विश्व में फैलाने का काम किया और इसके द्वारा निर्माण किए गए सिंह स्तंभ को भारत देश के राजकीय चिन्ह के रूप में आंगीकर किया गया है]

सुयश

सङ्गत

शालिक

शालिशूक

सोमशर्मा

शतधन्वा

बृहद्रथ

पुष्यमित्र शुङ्ग


पुष्यमित्र का अग्निमित्र और अग्निमित्र का सुज्येष्ठ होगा ॥ 15-16 ॥ सुज्येष्ठ का वसुमित्र , वसुमित्र का भद्रक और भद्रक का पुलिन्द, पुलिन्द का घोष और घोष का पुत्र होगा वज्रमित्र ॥ 17 ॥वज्रमित्र का भागवत और भागवत का पुत्र होगा देवभूति । शुङ्गवंश के ये दस नरपति एक सौ बारह वर्ष तक पृथ्वी का पालन करेंगे ॥ 18 ॥


पुष्यमित्र शुङ्ग

[शुङ्ग वंश, 10 राजा, 112 वर्ष]

अग्निमित्र

सुज्येष्ठ

वसुमित्र

भद्रक

पुलिन्द

घोष

वज्रमित्र

भागवत

देवभूति

वसुदेव


परीक्षित, शुङ्ग वंशी नरपतियों का राज्यकाल समाप्त होने पर यह पृथ्वी कण्व वंशी नरपतियों के हाथमें चली जायगी । कण्व वंशी नरपति अपने पूर्ववर्ती राजाओं की अपेक्षा कम गुणवाले होंगे। शुङ्गवंश का अन्तिम नरपति देवभूति बड़ा ही लम्पट होगा। उसे उसका मन्त्री कण्व वंशी वसुदेव मार डालेगा और अपने बुद्धिबल से स्वयं राज्य करेगा वसुदेवका पुत्र होगा भूमित्र, भूमित्र का नारायण और नारायण का सुशर्मा । सुशर्मा बड़ा यशस्वी होगा ॥ 19-20 ॥ कण्व वंश के ये चार नरपति काण्वायन कहलायेंगे और कलियुग में तीन सौ पैंतालीस वर्ष तक पृथ्वी का उपभोग करेंगे ॥ 21 ॥ प्रिय परीक्षित, कण्ववंशी सुशर्मा का एक शूद्र सेवक होगा - बली, वह अन्ध्र जाति का बड़ा दुष्ट होगा। वह सुशर्मा को मारकर कुछ समय तक स्वयं पृथ्वी का राज्य करेगा ॥ 22 ॥


वसुदेव

[कण्व वंश, 4 राजा, 345 साल ]

भूमित्र

नारायण

सुशर्मा

बली [शुद्र वंश]


इसके बाद उसका भाई कृष्ण राजा होगा। कृष्ण का पुत्र श्रीशान्तकर्ण और उसका पौर्णमास होगा ॥ 23 ॥ पौर्णमास का लम्बोदर और लम्बोदर का पुत्र चिबिलक होगा। चिविलक का मेघस्वाति, मेघस्वाति का अटमान, अटमान का अनिष्टकर्मा, अनिष्टकर्मा का हालेय, हालेय का तलक, तलक का पुरीषभीरु और पुरीषभीरु का पुत्र होगा राजा सुनन्दन ।। 24- 22 ॥ परीक्षित, सुनन्दन का पुत्र होगा चकोर; चकोर के आठ पुत्र होंगे, जो सभी 'बहु' कहलायेंगे। इनमें सबसे छोटे का नाम होगा शिवस्वाति वह बड़ा वीर होगा और शत्रुओं का दमन करेगा।


बली

[शुद्र वंश, 23 राजा, 456 साल]

कृष्ण

श्रीशान्तकर्ण

पौर्णमास

लम्बोदर

चिबिलक

मेघस्वाति

अटमान

अनिष्टकर्मा

हालेय

तलक

पुरीषभीरु

सुनन्दन

चकोर

शिवस्वाति

गोमतीपुत्र

पुरोमान

मेद

शिरा

शिवस्कन्द

यशश्री

विजय

चन्द्रविज्ञ

सात आभीर


शिवस्वाति का गोमतीपुत्र और उसका पुत्र होगा पुरोमान ॥ 26 ॥ पुरोमान का मेद, मेद का शिरा, शिरा का शिवस्कन्द, शिवस्कन्द का यशश्री, यज्ञश्री का विजय और विजय के दो पुत्र होंगे - चन्द्रविज्ञ और लोमधि ॥ 27 ॥ परीक्षित, ये तीस राजा चार सौ छप्पन वर्ष तक पृथ्वी का राज्य भोगेंगे ॥ 28 ॥ परीक्षित, इसके पश्चात् अवभृति नगरी के सात आभीर, दस गर्दभी और सोलह कङ्क पृथ्वी का राज्य करेंगे। ये सब के सब बड़े लोभी होंगे ॥ 29 ॥ इनके दस गुरुण्ड और ग्यारह मौन नरपति होंगे ॥ 30 ॥ मौनों के अतिरिक्त ये सब एक हजार निन्यानबे वर्ष तक पृथ्वीका उपभोग करेंगे, तथा ग्यारह मौन नरपति तीन सौ वर्ष तक पृथ्वी का शासन करेंगे।


सात आभीर [43 राजा, 1099 साल]

दस गर्दभी

सोलह कङ्क

दस गुरुण्ड

ग्यारह मौन नरपति [300 साल]


जब उनका राज्यकाल समाप्त हो जायगा, तब किलिकिला नामकी नगरी में भूतनन्द नाम का राजा होगा। भूतनन्द का वङ्गिरि, वङ्गिरिका भाई शिशुनन्दि तथा यशोनन्दि और प्रवीरक ये एक सौ छः वर्षतक राज्य करेंगे ।। 31- 33 ।। इनके तेरह पुत्र होंगे और वे सब के सब बाहिक कहलायेंगे। उनके पश्चात पुष्पमित्र नामक क्षत्रिय और उसके पुत्र दुर्मित्र का राज्य होगा ॥ 34 ॥ परीक्षित, बाह्निकवंशी नरपति एक साथ ही विभिन्न प्रदेशों में राज्य करेंगे। उनमें सात अन्न देश के तथा सात ही कोसल देश के अधिपति होंगे, कुछ विदूर- भूमि के शासक और कुछ निषध देश के स्वामी होंगे ॥ 35 ॥


ग्यारह मौन नरपति [300 साल]

भूतनन्द [3 राजा, 106 साल]

वङ्गिरि

शिशुनन्दि



शिशुनन्दि

बाहिक

पुष्पमित्र[क्षत्रिय]

दुर्मित्र

विश्वस्फूर्जि


इनके बाद मगध देशका राजा होगा विश्वस्फूर्जि । यह पूर्वोक्त पुरञ्जय के अतिरिक्त द्वितीय पुरञ्जय कहलायेगा । यह ब्राह्मणादि उच्च वर्णोंको पुलिन्द, यदु और मद्र आदि म्लेच्छप्राय जातियों के रूप में परिणत कर देगा ॥ 36 ॥ इसकी बुद्धि इतनी दुष्ट होगी कि यह ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंका नाश करके शूद्रप्राय जनता की रक्षा करेगा। यह अपने बल वीर्यसे क्षत्रियों को उजाड़ देगा और पद्मवती पुरीको राजधानी बनाकर हरिद्वार से लेकर प्रयागपर्यन्त सुरक्षित पृथ्वीका राज्य करेगा ॥ 37 ॥


परीक्षित, ज्यों-ज्यों घोर कलियुग आता जायगा, त्यों-त्यों सौराष्ट्र, अवन्ती, आभीर, शूर, अर्बुद और मालव देशके ब्राह्मणगण संस्कारशून्य हो जायँगे तथा राजालोग भी शूद्रतुल्य हो जायँगे ॥ 38 ॥ सिन्धुतट, काश्मीर मण्डल पर प्रायः शूद्रों का संस्कार एवं ब्रह्मतेज से हीन नाममात्रके द्विजों का और म्लेच्छोंका राज्य होगा ॥ 39 ॥


चन्द्रभागाका तटवर्ती प्रदेश, कौन्ती पुरी और परीक्षित, ये सब के सब राजा आचार विचारमें म्लेच्छप्राय होंगे। ये सब एक ही समय भिन्न-भिन्न प्रान्तों में राज्य करेंगे। ये सब के सब परले सिरे के झूठे, अधार्मिक और स्वल्प दान करनेवाले होंगे। छोटी-छोटी बातों को लेकर ही ये क्रोध के मारे आग बबूला हो जाया करेंगे ॥ 40॥


ये दुष्ट लोग स्त्री, बच्चों, गौओं, ब्राह्मणों को मारने में भी नहीं हिचकेंगे। दूसरे की स्त्री और धन हथिया लेनेके लिये ये सर्वदा उत्सुक रहेंगे। न तो इन्हें बढ़ते देर लगेगी और न तो घटते क्षण में रुष्ट तो क्षण में तुष्ट । इनकी शक्ति और आयु थोड़ी होगी ॥ 41 ॥ इनमें परम्परागत संस्कार नहीं होंगे। ये अपने कर्तव्य कर्मका पालन नहीं करेंगे। रजोगुण और तमोगुणसे अंधे बने राजा के वेषमें वे म्लेच्छ हो होंगे।


वे लूट खसोट कर अपनी प्रजाका खून चूसेंगे ॥ 42 ॥ जब ऐसे लोगों का शासन होगा, तो देश की प्रजामें भी वैसे ही स्वभाव, आचरण और भाषणकी वृद्धि हो जायगी। राजा लोग तो उनका शोषण करेंगे ही, वे आपस में भी एक दूसरेको उत्पीड़ित करेंगे और अन्ततः सब-के-सब नष्ट हो जायेंगे ।। 43 ।।


यदि हम भागवद पुराण में वर्णित इन ऐतिहासिक घटनाओं को देखे तो ये तय हो जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण का पदार्पण इस धरती पर लगभग 4000 साल पहले हुआ है। अभी 2022 चल रहा है। चंद्रगुप्त मौर्य का जन्म लगभग 345 ईसा पूर्व माना जाता है। चंद्रगुप्त मौर्य के शासन काल से पहले के राजवंशों का वर्णन बड़े विस्तार से किया गया है।


चंद्रगुप्त से पहले मगध के नरेश जरासंध के वंश के शासकों का वर्णन किया गया है, जिसकी अवधि तकरीबन 1000 साल की बताई गई है। तो मगध वंश के पश्चात प्रद्योत वंश का वर्णन किया गया है, जिसकी अवधि लगभग 148 साल की बताई गई है।


इसी प्रकार प्रद्योत वंश के अवसान के बाद शिशुनाग वंश के बारे में बताया गया है जिसमें 10 राजा हुए और इसका कार्यकाल लगभग 360 साल तक रहा है। इसी शिशुनाग वंश का अंतिम शासक नंद हुआ था जिसका वध करने के बाद चंद्रगुप्त मौर्य सत्ताधीन हुआ था।


इस प्रकार हम देखते हैं कि जरासंध और चंद्रगुप्त मौर्य के बीच तीन वंशों का जिक्र है। खुद जरासंध का मगध वंश जिसमे कि 23 राजा हुए और जिन्होंने लगभग 1000 साल तक शासन किया। फिर उसके बाद प्रद्योत वंश जिसमे कि 5 राजा हुए तथा जिसकी अवधि लगभग 148 साल की बताई गई।


फिर प्रद्योत वंश के बाद शिशुनाग वंश के बारे में बताया गया है कि जिसमें 10 राजा हुए और इसका कार्यकाल लगभग 360 साल साल बताया गया है। इस प्रकार हम देखते हैं कि जरासंध और चंद्रगुप्त मौर्य के बीच लगभग 38 [23+5+10] राजाओं का वर्णन किया गया है तथा इसके बीच का समय 1508 साल [1000+148+360] का समय अंतराल आता है।


चंद्रगुप्त मौर्य का खुद का शासन काल लगभग 345 ईसा पूर्व बताया गया है। इसप्रकार हम देखे तो जरासंध का अस्तित्व लगभग 1853 ईसा पूर्व [1508+345] आता है। यदि वर्तमान समय से इस अवधि को देखें तो जरासंध का अस्तित्व लगभग 4053 साल [2200+1853] पहले आता है।


जरासंध भगवान श्रीकृष्ण का समकालीन था। जरासंध भगवान श्रीकृष्ण के मामा कंस का दामाद भी था। जरासंध ने श्रीकृष्ण पर 21 बार चढ़ाई भी की थी तथा जरासंध का वध भगवान श्रीकृष्ण की सलाहानुसार भीम ने उनकी हीं उपस्थिति में की थी। इसप्रकार हम कह सकते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण आज से लगभग 4000 साल पहले इस धरती पर अवतरित हुए थे।


ठीक इसी प्रकार ये भी कहा जा सकता है कि महाभारत की घटना भी कोई कपोल कल्पित घटना नहीं है , बल्कि निश्चित रूप से ये घटना आज से लगभग 4000 साल पहले घटित हुई है। इसे मात्र एक साहित्यिक रचना मान लेने की भूल पश्चिमी इतिहासकारों से हुई है। वास्तविकता तो ये है कि महाभारत का युद्ध प्रमाणिक रूप से लड़ा गया था।


भगवान श्रीकृष्ण और भगवान श्रीराम को केवल कहानियों का हिस्सा मान लेना उचित नहीं जान पड़ता। भागवद पुराण में वर्णित घटनाओं के आधार पर ये निश्चित रूप कहा जा सकता है कि जिस प्रकार चंद्रगुप्त मौर्य और सिकंदर प्रमाणिक थे , बिल्कुल उसी प्रकार भगवान श्रीकृष्ण भी।


इस कहानी में भगवान श्रीकृष्ण की प्रमाणिकता को साबित करने के लिए चंद्रगुप्त का इस्तेमाल एक मानक के रूप में किए जाने का कारण ये है कि भागवद पुराण में वर्णित राजाओं में चंद्रगुप्त मौर्य को पहला शासक है।जिसकी प्रमाणिकता के बारे में पश्चिमी इतिहासकार भी संदेह नहीं करते।


इस प्रकार हम देखते हैं कि भगवान कृष्ण की उपस्थिति को ठीक उसी तरह से प्रमाणिक माना जा सकता है जिस प्रकार कि गौतम बुद्ध, चंद्रगुप्त मौर्य, सिकंदर, पोरस, अजातशत्रु, बिम्बिसार, चाणक्य और आम्रपाली इत्यादि के अस्तित्व को। ये बिल्कुल स्पष्ट है कि भगवान श्रीकृष्ण इस धरती पर ठीक उसी प्रकार अस्तित्वमान थे जिस प्रकार कि गौतम बुद्ध।


अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित


25 сентября 2022 г. 7:30:52 0 Отчет Добавить Подписаться
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AJAY AMITABH Advocate, Author and Poet

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