ajayamitabh7 AJAY AMITABH

ये बात तो तय है कि दुर्योधन की पहली मुलाकात कर्ण से उस युद्ध कीड़ा के मैंदान में नहीं बल्कि काफी पहले हीं हो गई थी। बचपन से दोनों एक दुसरे के परिचित थे और साथ साथ हीं द्रोणाचार्य से शिक्षा भी ग्रहण कर रहे थे


Não-ficção Todo o público.
0
995 VISUALIZAÇÕES
Completa
tempo de leitura
AA Compartilhar

पहली मुलाकात:कर्ण और दुर्योधन की

महाभारत पर आधारित टेलीविजन सीरियलों और अनगिनत मूवी में ऐसा दिखाया जाता रहा है कि दुर्योधन की मुलाकात कर्ण से सर्वप्रथम युद्ध क्रीड़ा के मैदान में हुई थी। गुरु द्रोणाचार्य पर भी ये आरोप लगाया जाता रहा है कि उन्होंने कर्ण को धनुर्विद्या सिखाने से मना कर दिया था, क्योंकि कर्ण सूतपुत्र थे। जबकि वास्तविकता तो कुछ और हीं है।


ना तो कर्ण की मुलाकात दुर्योधन से सर्वप्रथम युद्ध क्रीड़ा के मैदान में हुई थी और ना हीं गुरु द्रोणाचार्य ने कर्ण को कभी धनुर्विद्या सिखाने से मना किया था। महाभारत के आदिपर्व में जिक्र आता है कि कर्ण और दुर्योधन एक दूसरे को बचपन से हीं जानते थे।



बचपन में जब भीम दुर्योधन के भाइयों को तंग करते थे तो दुर्योधन ने चिढ़कर भीम को विष पिला दिया । इसका परिणाम ये हुआ कि भीम मृत्यु के करीब पहुंच गए। ये और बात है कि भीम के शरीर में वृक नामक अग्नि थी जिस कारण वह जीवित बच गए।


"यद्यपि वह विष बड़ा तेज था तो भी उनके लिये कोई बिगाड़ न कर सका | भयंकर शरीरवाले भीमसेनके उदरमें वृक नामकी अग्नि थी; अतः वहाँ जाकर वह विष पच गया || 39 ॥"


महाभारत महाग्रंथ के आदि पर्व महाभाग के संभव पर्व उपभाग के अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः अर्थात अध्याय संख्या 128 के 39 वें श्लोक में इस बात का वर्णन है कि कैसे भीम मरने से बच गए।



"एवं दुर्योधनः कर्णः शकुनिश्चापि सौबलः ।

अनेकैरभ्युपायै स्ताञ्जिघांसन्ति स्म पाण्डवान् ॥ 40 ॥


इस प्रकार दुर्योधन, कर्ण तथा सुबलपुत्र शकुनि अनेक

उपायो द्वारा पाण्डवों को मार डालना चाहते थे ॥ 40 ॥"


महाभारत महाग्रंथ के आदि पर्व महाभाग के संभव पर्व उपभाग के अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः अर्थात अध्याय संख्या 128 के 40 वें श्लोक में इस दुर्योधन और कर्ण के बचपन से हीं चिर परिचित सम्बन्ध का वर्णन है।


यहीं पर आदिपर्व के संभवपर्व के 40 वें श्लोक में वर्णन है कि दुर्योधन, कर्ण था सबलुपुत्र शकुनि आदि अनेक उपायों से पांडवों को मार डालना चाहते थे। इस श्लोक के दुर्योधन के साथ कर्ण का जिक्र शकुनि से पहले आता है । ये साबित करता है कि कर्ण के दुर्योधन के साथ घनिष्ठ संबंध बचपन से हीं थे।


गुरु द्रोणाचार्य पर ये भी आरोप लगाया जाता है कि उन्होंने उन्होंने कर्ण को धनुर्विद्या सिखाने से मना कर दिया था, क्योंकि कर्ण सूतपुत्र थे। उनपे ये भी आरोप लगाया जाता रहा है कि वो केवल राजपुत्रों को हीं शिक्षा प्रदान कर रहे थे। ये दोनों बातें हीं मिथ्या है।


महाभारत महाग्रंथ के आदि पर्व महाभाग के संभव पर्व उपभाग के एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय अर्थात अध्याय संख्या 131 के श्लोक संख्या में इस बात का वर्णन है कि कर्ण भी बाकि अन्य क्षत्रिय राज कुमारों के साथ गुरु द्रोणाचार्य से शिक्षा ग्रहण कर रहा था ।


"वृष्णयश्चान्धकाश्चैव नानादेश्याश्च पार्थिवाः |

सूतपुत्रश्च राधेयो गुरुं द्रोणमियात् तदा ॥ 11 ॥


वृष्णिवंशी तथा अन्धकवंशी क्षत्रिय, नाना देशों के

राजकुमार तथा राधानन्दन सूतपुत्र कर्ण – ये सभी

आचार्य द्रोणके पास (अस्त्र - शिक्षा लेने के लिये )आये ॥ 11 ॥"


गुरु द्रोणाचार्य कर्ण को कौरवों और पांडवों के साथ साथ हीं शिक्षा प्रदान कर रहे थे। उनके पास न केवल कौरव और पांडव , राधा पुत्र कर्ण अपितु वृष्णिवंशी तथा अन्धकवंशी क्षत्रिय आदि राजकुमार भी शिक्षा के लिए गुरु द्रोणाचार्य के पास आए थे।


"स्पर्धमानस्तु पार्थेन सूतपुत्रोऽत्यमर्पणः |

दुर्योधनं समाश्रित्य सोऽवमन्यत पाण्डवान् ॥ 12 ॥


सूतपुत्र कर्ण सदा अर्जुनसे लाग-डाँट रखता और

अत्यन्त अमर्ष में भरकर दुर्योधनका सहारा ले

पाण्डव का अपमान किया करता था ॥12 ॥"

ये बात और है कि कर्ण बचपन के समय से हीं अर्जुन से ईर्ष्या रखता था और दुर्योधन के साथ मिलकर पांडवों का अपमान किया करता था। इसका कारण गुरु द्रोणाचार्य का पांडवों, विशेषकर अर्जुन के प्रति स्नेह था।


बड़े आश्चर्य की बात ये है कि महाभारत के आदि पर्व में , जहाँ पे कर्ण और दुर्योधन का जिक्र सर्वप्रथम आता है , उसका आधार हीं पांडवों के प्रति ईर्ष्या का भाव है । उन दोनों की मित्रता का आधार हीं पांडवों के प्रति बैर था । हालाँकि दोनों के अपने अपने कारण थे इस इर्ष्या के।


कर्ण का जिक्र भी महाभारत के आदिपर्व के संभव उप पर्व में पांडवों के साथ वैमनस्य के साथ हीं आता है। जाहिर सी बात थी , कर्ण के प्रतिभा तो थी परन्तु उसे बराबर का सम्मान और मौका नहीं मिल रहा था। बार बार अपमान की भावना से ग्रस्त हुए व्यक्ति के ह्रदय में आग नहीं तो और क्या हो सकती है ?


ये बात तो तय है कि दुर्योधन की पहली मुलाकात कर्ण से उस युद्ध कीड़ा के मैंदान में नहीं बल्कि काफी पहले हीं हो गई थी। बचपन से दोनों एक दुसरे के परिचित थे और साथ साथ हीं द्रोणाचार्य से शिक्षा भी ग्रहण कर रहे थे ।


हालाँकि आदि पर्व में इस बात का जिक्र नहीं आता कि कर्ण गुरु द्रोणाचार्य को छोड़कर गुरु परशुराम के पास कब पहुँच गया ? कारण जो भी रहा हो , ये बात तो निश्चित हीं जान पड़ती है कि कर्ण और दुर्योधन बचपन से हीं चिर परिचित थे।


अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित



28 de Junho de 2022 às 15:13 0 Denunciar Insira Seguir história
0
Fim

Conheça o autor

AJAY AMITABH Advocate, Author and Poet

Comente algo

Publique!
Nenhum comentário ainda. Seja o primeiro a dizer alguma coisa!
~